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         जलजीरा

 
गर्म दोपहर की धूप में
जब रास्ते भी
प्यास से उदास लगते हैं,
और हवा में धूल का स्वाद घुल जाता है,
तभी कहीं से एक मिट्टी के गिलास में
ठंडा सा इतिहास उतरता है
जलजीरा।

रेगिस्तान की सूखी जीभ से लेकर
दरबारों की नफासत तक
ठेले की सादगी में लौटता हुआ स्वाद है
जलजीरा।

कभी किसी सदी में
किसी रसोइए ने
पानी में डाला होगा- थोड़ा जीरा,
थोड़ी इमली, कुछ पत्ते पुदीने के
और अनजाने में
एक ऐसा पेय रच दिया
जो शरीर ही नहीं,
जीवन का भी व्याकरण बन गया।

यह पेय नहीं, एक संवाद है
अंदर की थकान और बाहर की तपन के बीच।

इसमें नमक है- पर संतुलित,
खट्टापन है- पर संयमित,
और यही इसका चरित्र है,
महँगे पेय की विज्ञापनी दुनिया से बचते हुए
जीवन को स्वाद देना।

- संजय सुजय बासल 
१ मई २०२६

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