अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

         जलजीरे सा प्यार

 
आम पना की मटकियाँ चल दीं ठेले बैठ
ललचाती आँखें कहें पी ले मत तू ऐंठ

खट्टा मीठा हो गया अपना भी व्यवहार
रिश्ते होते फालसे जलजीरे सा प्यार

जलजीरे को मिल गय जब नींबू का साथ
चटखारे लगने लगे घर घर हाथों-हाथ

जलजीरे से रच गया राम दास का लंच
तपती गर्मी साथ में प्याज मिर्च का क्रंच

लू लंपट ने जब किए मनमानी के वार
जलजीरा भी हो गये जनता के हथियार

- धीरेन्द्र द्विवेदी
१ मई २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter