अलसाने के दिन बीत गए, आया
मौसम जलजीरे का
इस दौर में बनते मीत नए, आया मौसम जलजीरे का
ठंडे ठंडे, ताज़ा-ताज़ा जलजीरे से भर रखे सभी,
घट पलक झपकते रीत गए, आया मौसम जलजीरे का
खट्टी-मीठी चुस्की लेकर जब लगे लबों को लब सिलने
हम हार रहे थे, जीत गए, आया मौसम जलजीरे का
जीरा, पोदीना, नमक, नींबू का घोल बनाकर दिया जिन्हें
उनके अब हम मनमीत भए, आया मौसम जलजीरे का
हर घूँट में सिमटी प्यास लिए, हर घूँट में लिपटी आस लिए
लिख डाले दोहे, गीत नए, आया मौसम जलजीरे का
रसपान बिना जीवन जीना जो पड़े अगर तो क्या होगा
ये सोच के हम भयभीत भए, आया मौसम जलजीरे का
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विनीता तिवारी
१ मई २०२६ |