अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       बुझा दे प्यास जलजीरा

 
मेजबानी का सुखद अहसास जलजीरा
शुष्क अधरों की बुझा दे प्यास जलजीरा

बन के' पाहुन तुम कभी आओ हमारे घर
तुम को' भी आ जायेगा फिर रास जलजीरा

शीशियों में हैं सलामत अनगिनत यादें
जादुई हर स्वाद का इतिहास जलजीरा

पेयजल होते बहुत से गर्मियों में पर
है सभी में एक केवल खास जलजीरा

"पुष्प" नींबू, हींग लाओ और पोदीना
दो बनाकर प्यार से इक ग्लास जलजीरा

- पुष्प लता शर्मा 
१ मई २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter