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       ठंडा जलजीरा

 
लबों पे आ गया मेरे अचानक ठंडा जल जीरा
सुकूँ दे रूह को मेरी कहाँ अब ऐसा जल जीरा

पुदीना, नीबू, जीरा, है नमक का मेल भी इस में
छुपा हर घूँट में इस के है अमृत जल सा जल जीरा

भरी गर्मी में ठंडी सी जो कोई छाँव आ जाए
लिपट जाती है तन से छाँव तब ही भाता जलजीरा

नहीं बाजार की है शानो शौकत बात लज़्ज़त की
बसा है सादगी में हर ज़ुबाँ पेअपना जल जीरा

कि लेकर याद बचपन की सभी के घूंट में उतरे
दिलों को छू सके ऐसा बना , है मेरा जल जीरा

किसी महफ़िल में मय की प्यास जब बढ़ने लगे 'आभा'
तभी भा जाए सब को है बना आला सा जल जीरा

- आभा सक्सेना 'दूनवी'
१ मई २०२६

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