कड़क पकौड़े गोभी वाले

 
  स्वाद ग़ज़ब का, याद सुनहरी
लेकर आयी, पहली बारिश

खट्टी चटनी मीठी चटनी
कड़क पकौड़े गोभी वाले
"और-और" सब बोल रहे हैं
अम्मा जी का जादू देखो
होश नहीं है अभी किसी को
पानी छत से
चूता रिस-रिस

मौसम में मन उलझ गया है
है ज़ुबान पर केवल बचपन
चून्नू बैग उठाकर लाया
छतरी भी ले आऊँ क्या
बापू ने मन बदल लिया है
आज नहीं मैं
जाऊँ ऑफ़िस

- डॉ. शैलेश गुप्त 'वीर'
१ जुलाई २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter