पकौड़े बना रहे हैं

 
  लिए हाथ में झार पकौड़े बना रहे हैं
हुई जीत या हार पकौड़े बना रहे हैं

जेठ विरोधी दल-सा आग उगलता था
सावन रहा दुलार पकौड़े बना रहे हैं

जो अव्वल थे वो फिर भी हैं चुप बैठे
उछल रहे दो चार पकौड़े बना रहे हैं

बेसन की हालत कुछ पतली लगती है
करो कोई उपचार पकौड़े बना रहे हैं

आलू काँदा हरी मिर्च मिल गए सभी
मिली-जुली सरकार पकौड़े बना रहे हैं

होरी, गोबर, धनिया को उम्मीद है ये
मिलेंगे अब हर बार पकौड़े बना रहे हैं

कलम घिसाई बहुत हो गई 'रीत' चलो
खा लो भर चटखार पकौड़े बना रहे हैं

- परमजीत कौर 'रीत'
१ जुलाई २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter