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          रजनीगंधा रूप

 

 

रजनीगंधा रूप तुम्हारा
बसा हुआ तन-मन में

देह न बासी हुई तुम्हारी
रूप न कुम्हलाया
मुस्काता श्वेताभ बाँकपन
यौवन पर छाया
जब-जब गंध बिखेरी तुमने
धूम मची उपवन में

अनजाना मधुमास पास
आ-आ कर ठिठक गया
अंग-अंग की लाज तुम्हारी
गढ़ती मिथक नया
जब देखा तब वैसा पाया
जीवन के दरपन में

ऐ मेरे पल-छिन के साथी
साथ-साथ मुरझाना
रंग-रंग निखरें कण-कण के
जब तक साथ निभाना
तुम सा मिला न कोई दूजा
ढूँढ थका वन-वन में

- उमा प्रसाद लोधी
१ सितंबर २०२१

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