अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

          रजनीगंधा फूल

 

इस आँगन में सजा दिये हैं
किसने रजनीगंधा फूल

किसी पुरानी याद सरीखे
धीरे धीरे उमग रहे हैं
मधुर गंध के दीपक जैसे
इस आसन पर सुलग रहे हैं
इत्र बसी पोटली वाले
गहने रजनीगंधा फूल

दुग्ध हँसी की किरन सरीखे
पोर पोर चाँदनी सजाए
शरद मेघ-सी धवल लुनाई
रूप राग रस रंग नहाए
तारों जड़ी चूनरी वाले
सपने रजनीगंधा फूल

ये थकान के कठिन पलों में
विश्रामों के संग रहे हैं
तुहिन कणों से भीगे-भीगे
मधुर पलों के अंग रहे हैं

रखे सदा सहेजकर मन में
हमने रजनीगंधा फूल

- पूर्णिमा वर्मन
१ सितंबर २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter