अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

          तुम मेरी रजनीगंधा हो

 

 

मन का हर कोना महकाती
तुम मेरी रजनीगंधा हो

दिन बगिया में रही विहंसती
धूप चढ़ी घर में घुस आई
रजनीगंधा बाहुपाश में
दहकी रात बजी शहनाई
स्मृतियों में हँसती गाती
तुम मेरी रजनीगंधा हो

धवल चाँदनी में भीगी सी
तैर रही है झील किनारे
चाँद नशे में झूम रहा है
मौसम खुश है देख नजारे
बालों को मेरे सहलाती
तुम मेरी रजनीगंधा हो

कोमल मृदु स्पर्श तुम्हारा
नींद उनींदी सी मुस्काये
सिर काँधे पर टिका हुआ है
कुछ सपने ऐसे भी आये
मधु स्वर कानों में बतियाती
तुम मेरी रजनीगंधा हो

- कृष्ण भारतीय
१ सितंबर २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter