अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

          बीत गए दिन

 

 

बीत गए दिन अवसादों के
फिर महके मन रजनीगंधा
जारी जग का गोरखधंधा

जीवन सुख दुख आस निराशा
लुप्त मदारी खुला तमाशा
रंग निरंतर रहें बदलते
काल चक्र गढ़ता परिभाषा
बहरे के हित गाता गूँगा
अचरज से देखे इक अंधा
जारी जग का गोरखधंधा

जब जब अत्याचार बढ़ेंगे
तब तब मधुसूदन जन्मेंगे
भूल गए रणछोड़ वचन जब
फिर कैसे दुर्भाग्य कटेंगे
सीधे शब्द कहो ज्ञानेश्वर
नहीं समझ पाता मैं संधा
जारी जग का गोरखधंधा

बोल रही है रात महकती
उजले दिन की आमद सुन लो
भेद ख़त्म हों मन से मन के
प्यार भरी परिभाषा गुन लो
ध्वस्त करें मनसूबे रिपु के
आज मिला कंधे से कंधा
जारी जग का गोरखधंधा

- अमित खरे
१ सितंबर २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter