अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

          एक टहनी रजनीगंधा की

 

 

एक टहनी रजनीगंधा की मुझे तुम सौंपना
चाहती मैं प्रीत के स्वर्णिम
पलों में लौटना

केश हैं
उलझे हुए से बल बहुत उनमें पड़े
लग रहा है स्वेद कण उनमें नगीनों से जड़े
इन लटों के बल समय पर
हो सके तो खोलना

भाद्रपद में
नैन गीले कह रहे दुखड़े कई
दूर मुझसे हैं ख़ुशी की धूप के टुकड़े कई
बोल मीठे दो अगर चाहो कभी
तो बोलना

छोड़ कर
मुझको अकेले तुम कभी जाना नहीं
कोई शिकवा और शिकायत मन में तुम लाना नहीं
आँख भर आए जो मेरी अश्रु
मेरे पोंछना

- आभा सक्सेना
१ सितंबर २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter