अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

बिना पन्हैंया तपी धूप में  

.
बिना पन्हैंया तपी धूप में
कैसे चल पायें
चलो नीम के नीचे बैठें
थोड़ा गपयाएँ

बहुयें गईं मायके अपने
मिलने अम्मा से
जैसे जाते हैं परवाने
मिलने श‌म्मा से
निश्चित ही अम्मा बाबू का
मन महका होगा
दरवाजा खिड़की बिस्तर‌
आंगन महका होगा
दौड़ा होगा भाई
बहिन को भीतर ले जाएँ

गर्द गुबार धूल धक्कड़ से
घर सहमा होगा
अम्मा के कानों में
ढेरों मैल जमा होगा
सरसों वाला तेल गरम‌
बिटिया कर लायेगी
अम्मा के कानों में
कुछ बूंदें टपकायेगी
भौजी बोलेगी
आओ अब भीतर सुस्ताएँ

जहाँ कभी गूँजा करती थी
शिवजी की हर हर‌
भौजी के आने से कैसा
टूट गया वह घर‌
अब तो मन में दहक रहे
टेसू से अंगारे
केवल और केवल‌ चर्चा में
हिस्से बटवारे
क्यों स्वच्छंद हुई जातीं
आशाएँ इच्छाएँ?

अब पलाश के फूल कहाँ
जाने पहचाने हैं
नई पीढ़ी के लिये
आजकल अंजाने से हैं
लिखा किताबों में जब तब‌
वह बच्चे पढ़ते हैं
अब पलाश को सपनों की
आँखों से गढ़ते हैं
लाकर ताजे फूल कभी
बच्चों को दिखलाएँ

--प्रभु दयाल
२० जून २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter