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फागुन में टेसू बन जाऊँ  

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फागुन में टेसू बन जाऊँ,
सावन मेघ मल्हार
भरी दुपहरिया जेठ में शीतल छाया क्यार

ऋतु बसंत में
हवा बसंती, पूरबा की पुरवाई
बनकर खेलूं आंख-मिचौली घर, आंगन, अमराई
भादो की काली रातों में
दीप जलाऊँ द्वार

पूस-माघ की
बाहों में 'चांद' जले जब रातों को
दिल ढूँढे फिर, फूल 'पलाश' के रंग-रंगे जज्बातों को
बन बदरा, घनघोर घटा, तन पर
बरसाऊँ 'प्यार'

--नियति वर्मा
२० जून २०११

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