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खिलते हुए पलाश   

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खिलते हुए पलाश

बिन तुम्हारे होलिका त्यौहार
था इक कल्पना भर
हाट में बाक़ायदा
तुम स्थान पाते थे बराबर

अब कहाँ वो रंग
वो रंगीन भू-आकाश
खिलते हुए पलाश

मख अगन सा दृष्टिगोचर
है तुम्हारा यह कलेवर
पर तुम्हारे पात नर ने
वार डाले बीडियों पर

पर न हारे तुम तनिक भी
औ हुए न हताश
खिलते हुए पलाश

- नवीन चतुर्वेदी
२० जून २०११

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