अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

गुलमुहर के वदन

 

किस कदर हँस रहे गुलमोहर के वदन
देखिए तो सही

जेठ में ये पहनकर
हरी पत्तियाँ
धूप में खे रहे
छाँव की किश्तियाँ
हैं अनोखे भले गुलमोहर के चलन
देखिए तो सही

लू थपेड़े सहे
आँधियों से लड़े
नेह सागर लिए
जल रहे हैं खड़े
धूप के यज्ञ में गुलमोहर के हवन
देखिए तो सही

कौन है जो जले
फिर हँसे, छाँव दें
दोपहर जेठ की
फूल सा ठाँव दें
त्याग से मन हुए गुलमोहर के मगन
देखिए तो सही

- बृजनाथ श्रीवास्तव
९ अप्रैल २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter