अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

वन अशोक लहराया
 

वन अशोक लहराया
तन को मिली न छाया

बाबा की मेहनत
राजा के हिस्से जाती
धूप अगोरें दादी
रानी मौज मनाती
रहा पेड़ के नीचे
फिर भी दिन अकुलाया

झुके शीश ने
ऋतुओं के परिवर्तन झेले
प्रासादों में लगे रहे
वासन्ती मेले
"अ" छीना सूरज ने
घर में शोक समाया

शोक मेटने,
था अशोक का वृक्ष लगाया
किन्तु नियति को
यह उद्यम भी रास न आया
रहा चिढ़ाता ठूँठ
कभी खिल सकी न काया

- कल्पना मनोरमा 

१ अगस्त २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter