अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

फूल खिले अमलतास के





 

सखि! आये दिन गर्मी तपास के
फूल खिले अमलतास के।।

कैसों मौसम हो गयो बैरी
काटे कटती नहीं दुपहरी
सूरज बन के बैठो पहरी
मीत लगैं घने पेड़ आसपास के।
फूल खिले अमलतास के

कैसी मौसम की मजबूरी
भावै हलुआ खीर न पूरी
रहती हरदम प्यास अधूरी
देह दुबली सी भई बिन प्रयास के।
फूल खिले अमलतास के

पूरी नींद न होय हमारी
आंखें हो गईं भारी भारी
कैसे कैसे रात गुजारी
भये सैंयाँ भी ऊपर पचास के।
फूल खिले अमलतास के

शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
16 जून 2007

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter