अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

१-
अभी अभी
पत्तियों को छूकर
गुजर गी है हवा
वे देर तक सिहरती रहेंगी!

1

मदन मोहन पांडे
की पाँच क्षणिकाएँ
प्रेम

२-
बहुत समय से
नहीं चली हवा
तप्त दोपहर के बीच
पत्तियाँ इंतजार में हैं!

३-
अपनी सुगंध में कैद
एक फूल
एक दिन झर गया शाख से
तितलियों के पास
उसकी खबर नहीं थी!
 

४-
मैं जब प्रेम में रहा
उसके लिए शब्द नहीं सूझे
अब हजारों शब्दों से घिरा हूँ
प्रेम नहीं है मेरे पास!
 
५-
एक दूसरे से
इतनी बार, इतनी बातें
की थीं हमने
कि हमारे बीच एक पुल बन गया
लेकिन प्रेम
उसके ऊपर होकर नहीं गुजरा
गो कि एक नदी
उस पुल के नीचे
हरहराती रही बरसों!

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter