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राम मनोहर त्रिपाठी

 

 

पहाड़ का प्रतिशोध

जगह जगह
मिट्टी और गिट्टी खोदकर
पहाड़ को घायल कर दिया
सुंदर हरे भरे टीलों को
घावों से भर दिया
पहाड़ अपना दर्द नहीं कहते
चुपचाप सहते हैं
किस तरह उन पर होती है चोट
बारूदी विस्फोट
बेचारे पहाड़ काटे जा रहे हैं
इनके अंग शहरों को बाँटे जा रहे हैं
वहाँ उठाए जा रहे हैं
आवासों के पहाड़
इसी मिट्टी और गिट्टी से
थोड़े दिन पहाड़
ये हमले झेल लेंगे चुपचाप
फिर लेंगे फैसला अपने आप
जब पहाड़ नाराज़गी में
अपना पूरा बदन हिलाएँगे

१ अगस्त २००६

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