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अभिव्यक्ति  

३१. ५. २०१०

अंजुमन । उपहार । काव्य संगम । गीत । गौरव ग्राम । गौरवग्रंथ । दोहे । पुराने अंक । संकलन । हाइकु
अभिव्यक्ति । हास्य व्यंग्य । क्षणिकाएँ । दिशांतर । नवगीत की पाठशाला

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यह तो देखिए
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  हो गई है सोच
दहशतगर्द यह तो देखिए
जिंदगी है मौत की
हमदर्द यह तो देखिए

रहनुमाई रासलीला में
यहाँ मशगूल है,
ये भलाई भी करेगी
मानना ये भूल है,
चापलूसी फल रही
बेपर्द यह तो देखिए।

फर्क हम कैसे करें
अब घर, शहर, सुनसान में,
लुट रही है, राखियाँ
हर खेत हर खलिहान में,
खून सबका हो गया है
सर्द यह तो देखिए।

चाँद से आगे गए
नजदीकियों की खोज में,
फासले बढते रहे
खुदगर्जियों के बोझ में,
बाँटता है कौन किसका
दर्द यह तो देखिए।

- शंभु शरण मंडल
इस सप्ताह

गीतों में-

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छंदमुक्त में-

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छंदमुक्त में-
कुमार विश्वबंधु

गीतों में-
रामेश्वर कांबोज हिमांशु

अंजुमन में-
मदन मोहन अरविन्द

पुनर्पाठ में-
राजेश कुमार सिंह

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन
-|- सहयोग : दीपिका जोशी
   
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