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. ७. २०१२

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नाव का दर्द
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सूरज फिर
से हुआ लाल है

मैं नैया
मेरी क़िस्मत में
लिक्खे हैं दो कूल-किनारे
पार उतारूँ मैं सबको मुझको ना कोई
पार उतारे

जीवन की
संगिनी बनी है बहती नदिया - बहता पानी
क्या मज़ाल जो धार गह सकूँ
संग-संग बह लूँ मनमानी

कोई इस तट बना खेवइया
उस तट कोई
खड़ा पुकारे

उल्टी-सीधी
लहरों से लड़ने-भिड़ने की नियति मिल गई
सख्त थपेड़ों की मारों से
कनपटियों की चूल हिल गई

औघट घाट लगे तो जुटकर
छेद गिन रहे
लाकड़हारे

मेरी राह
धरें पानी पर उठती-गिरती वे पतवारें
जिनको ख़ुद का पता नहीं
रह-रहकर इधर-उधर मुँह मारें

गैरों के हाथों कठपुतली-सा
जो नाचें उठ
भिनसारे
1
-दिनेश सिंह

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

सहयोग : दीपिका जोशी

 
 
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