वसंत रजनी
              - महादेवी वर्मा

 

धीरे धीरे उतर क्षितिज से
आ वसंत-रजनी

तारकमय नव वेणीबंधन
शीश-फूल कर शशि का नूतन
रश्मि-वलय सित घन-अवगुंठन

मुक्ताहल अभिराम बिछा दे
चितवन से अपनी
पुलकती आ वसंत-रजनी

मर्मर की सुमधुर नूपुर-ध्वनि
अलि-गुंजित पद्मों की किंकिणि
भर पद-गति में अलस तरंगिणि

तरल रजत की धार बहा दे
मृदु स्मित से सजनी
विहँसती आ वसंत-रजनी

पुलकित स्वप्नों की रोमावलि
कर में हो स्मृतियों की अंजलि
मलयानिल का चल दुकूल अलि

चिर छाया-सी श्याम, विश्व को
आ अभिसार बनी
सकुचती आ वसंत-रजनी

सिहर सिहर उठता सरिता-उर
खुल खुल पड़ते सुमन सुधा-भर
मचल मचल आते पल फिर फिर

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