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वर्षा महोत्सव

वर्षा मंगल
संकलन

पर्वत प्रदेश में पावस

पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,
पल-पल परिवर्तित प्रकृति देश।

मेखलाकार पर्वत अपार
अपने सहस्त्र दृग सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार-बार
नीचे जल में निज महाकार,

जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण-सा फैला है विशाल!

गिरि का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस-नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों-से सुंदर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!

गिरिवर के उर से उठ-उठ कर!
उच्चाकांक्षाओं-से तरुवर
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर,
अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर!

उड़ गया, अचानक, लो भूधर
फड़का अपार पारद के पर!
रव शेष रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अंबर!

धँस गए धरा में सभय शाल!
उठ रहा धुआँ, जल गया ताल!
यों जलद यान में विचर, विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल!

(वह सरला उस गिरि को कहती थी बादलघर)

इस तरह मेरे चितेरे हृदय की
बाह्य प्रकृति बनी चमत्कृत चित्र थी,
सरल शैशव की सुखद सुधि-सी वही
बालिका मेरी मनोरम मित्र थी!

- सुमित्रानंदन पंत
21 अगस्त 2001

   
  

मेह क्या बरसा

मेह क्या बरसा
घरों को लौट आए
नेह वाले दिन

हाट से लौटे कमेरे
मुश्किलों से मन बचा कर
लौट आए छंद में कवि
शब्द की भेड़ें चरा कर

मेह क्या बरसा
भले लगने लगे हैं
स्याह काले दिन

कोप घर से लौट
धरती ने हरी मेहँदी रचाई
वीतरागी पंछियों ने
गीतरागी धुन बनाई

मेह क्या बरसा
लगे मुरली बजाने
गोप ग्वाले दिन

कुरकुरे रिश्ते बने
कड़वे कसैले पान थूके
उमंगें छत पर चढ़ीं
मैदान में निकले बिजूके

मेह क्या बरसा
सभी ने हाथ में लेकर
उछाले दिन

-महेश अनघ

16 अगस्त 2005

मेघ घटा घनघोर

अश्व वेग-सी दौड़ गई है
मेघ घटा घनघोर
बूँदों की पायल को पहने
नाच रहा मन मोर
यमुना के तट वंशी बजाए
गोपियों संग चितचोर
धरती पर झमझम ये बूँदें
खूब मचाए शोर

-प्रत्यक्षा
16 अगस्त 2005

 

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