अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

आए कैसे बसंत

 

  मौसम की माया है,
धुंध-भरा साया है –
आए कैसे बसंत?

रोज़-रोज़ काट रहे,
हर टहनी छाँट रहे!
घोंसला बनाने को,
कैसे वे आएँगे?
सुन उनका कल-कूजन,
क्या अब अँखुआएँगे?

नन्हे उन पंखों को,
पाए कैसे अनंत?
स्वरलहरी डूब रही,
गाए कैसे बसंत?
आए कैसे बसंत?

कचरे से पाट रहे,
ख़ुशियों को डाँट रहे!
महक भरे झोंके अब,
कैसे आ पाएँगे?
नेह-भरे सपने अब,
कैसे मुस्काएँगे?

सपनों का इंद्रधनुष,
पाए कैसे दिगंत?
मन-कुंठा फूल रही,
भाए कैसे बसंत?
आए कैसे बसंत?

--रावेंद्रकुमार रवि

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter