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नये साल की स्वर्ण रश्मियाँ
 
ऊषा ले आई भूतल पर
नये साल की स्वर्ण रश्मियाँ

चलता रहता समय का पहिया
निशिदिन कभी नहीं यह रुकता
सुख दुख में भी चले निरंतर
देख रहा जग हँसता रोता
फूट रहे देखो नव अंकुर
आतुर खिलने को हैं कलियाँ

नये भाव चेहरे पर लेकर
खुश रहने में सभी लगे हैं
रात नींद गहरी मेँ सो कर
लिए ताजगी सुबह जगे हैं
सुप्रभात का कलरव करती
आँगन में चहकी हैं चिड़ियाँ

बीत चुकी यादों को लेकर
जीवन बढ़ता रहता आगे
नई सोच होती जब विकसित
समझो तभी भाग्य नव जागे
नये दृश्य की पृष्ठभूभि में
धुँधलाती हैं कल की छवियाँ

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
२९ दिसंबर २०१४

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