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साल नया है
 
साल नया है
खुशी के पल चलो मिल–बाँट लें।

उलझनें
सुलझी हुईं या सुलझनें उलझी हुईं हैं,
फिर पुराने मोड़ से जुड़ती हुई राहें नई हैं
हाथ में ले हाथ रस्ते मंजिलों
के काट लें।

दौर है लफ्फाजियों
का, चुटकुलों फंतासियों का,
सादगी संकुचित पारा फैलता ऐय्याशियों का
सत्व के आखेटकों को एक स्वर
हो डाँट लें।

शब्द थोड़ा
कह सके बातें बहुत अनकही ही हैं,
जिन्दगी की राह गलबहियाँ कभी बतकही भी है।
नेह की बिन्दी गुमानी मान के
सिर टाँक लें।

समय मिश्रित
का कुशल की व्यंजनायें दोगली हैं,
मिठासों के बोल कुत्सित भाव की गाँठें घुली हैं
मिलावट के कंकड़ों से दाल,
चावल छाँट लें।

सियासत की
झील पर हैं स्वार्थ के उतरे कुहासे,
हारती प्रतिबद्धताएँ नीति के जुमले धुआँ से
काँपते विश्वास पर आशा की
जैकेट साँट लें।

– कृष्ण नन्दन मौर्य
३० दिसंबर २०१३

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