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यों ही बीत
जा रहीं सदियाँ, एक एककर वर्ष सभी
पल हैं धरे सहेजे अनगिन
जीवन के संघर्ष सभी
आना अपने संग
लिए तुम उस अतीत की गठरी को
सहज प्रीति सँग सरस वारुणी की रसवंती गगरी को
सारे दर्द हमारे अपने और
तुम्हारे हर्ष सभी
तजकर के
निश्चिन्त हो गए अपने राग-द्वेष सारे
मुक्त गगन में ज्यों विलुप्त हों उषाकाल चंचल तारे
समिधाओं संग जले हवन में दर्द,
दम्भ, अपकर्ष सभी
यद्यपि कभी
शेष है कितना गंगा में जल, बहने को
रंच न पश्चाताप कहीं है नहीं बचा कुछ कहने को
जो करने थे समय चक्र संग पूरे
हुए विमर्श सभी
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दरवाजों के
भीतर चर्चित होती यहाँ महफिलें हैं
चलने का है नाम जिंदगी छलनामयी मंजिलें हैं
देख लिए उत्तुंग शिखर के पतन
और उत्कर्ष सभी
- प्रो.विश्वम्भर शुक्ल
१ जनवरी २०२६ |