अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       नये साल में

 
नये साल में गीत लिखें कुछ नये भाव के ऐसे
हर शाखा पर पत्र-पुष्प नव
ऋतु बसंत में जैसे

ख़ुशियाँ हों हर घर आँगन में प्रेम प्यार हो मन में
श्रद्धा भाव रहे पूजा में धैर्य, ध्यान-चिंतन में
सोचें, दुखियों के दुख हम कब
मिल-बाँटेंगे, कैसे?

धर्म एक हो मानवता का फूले फले निरन्तर
जाति-धर्म, नस्लों, रंगों का रहे न कोई अंतर
कब तक मूक सहेंगे भेदभाव
का तांडव ऐसे

युवा बनें सुशिक्षित मानव त्यागें भय-आडम्बर
रखें नियंत्रण खुद अपना अपनी धरती, अम्बर पर
चढ़ें न मन पर रंग कभी इस
जग के ऐसे वैसे

-विनीता तिवारी
१ जनवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter