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      नये वर्ष की भोर

 

नई उम्मीदों से करती गठजोड़
आ पहुँची है द्वार हमारे
नये वर्ष की भोर!

लिए नई सौगात नई बाँकी चितवन
आँचल में ले आशाओं की सोन किरन
खींच रही है मुझे यहाँ से
बांधे अपनी डोर!

हम भी अब कुछ नया जरा हो लें
इस उत्सव में रंग नया घोले
सपनों को भर लें आँखों में
होकर और विभोर!

स्वागत है आगत के आवन का
नव दुल्हन के रूप सुहावन का
बिना गंध ही गमके घर-आंगन
बिन बादल ही
नाच उठे मन मोर!

- उदयशंकर सिंह उदय
१ जनवरी २०२६

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