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      समय मदारी

 
समय मदारी! खोल पिटारी
नये बरस की शुभ घड़ियों में
बाँटो अब सौगातें सारी|

धरती- अम्बर धुआँ-धुयाँ है
दरक रहे पर्वत-चट्टानें
वन-उपवन सब उजड़ गये हैं
पंछी ढूँढे ठौर-ठिकाने

फूँको कोई जंतर-मन्तर
बची रहे धरती बेचारी|

जात- धर्म तो- आड़ बहाना
हिंसा तांडव करती देखी
भूख-गरीबी निर्धन के घर
धनवानों की मस्ती देखी

फेर बदल कुछ ऐसा लाना
मिटे जगत से दुःख -लाचारी

नगर-डगर पर चलते-चलते
घुटन-निराशा आन मिलेगी
विश्वासों की अलख जगाना
रूप बदल वह संग चलेगी

आये हो तो गाँठ बाँध लो
खूब निभाना जिम्मेवारी |

नये बरस की नई सुबह में
मन की कह दी कितनी सारी
बाँटों अब सौगातें सारी।

- शशि पाधा
१ जनवरी २०२६

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