अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

     सूर्य के दस्तक लगाना

 
सूर्य के दस्तक लगाना
देखना सोया हुआ है

व्यक्त होने की जगह
क्यों शब्द लुंठित
जिस समय जग
अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो
कुंद होती दिख रही हो वेग की गति
और कर्कश वक्त
केंचुल छोड़ता हो

साधना जब
शौर्य का विस्तार चाहे
उग्र का पर्याय तब
खोया हुआ है

धूप के दर्शन नहीं हैं,
धुंध है बस
व्योम के उत्साह पर
कुहरा जड़ा है
जम रहा है आँख का पानी निरंतर
काल यह संक्रांति का
औंधा पड़ा है

अब प्रतीक्षा क्यों, शलाका हाथ ले लो
कोड़ दो संसार
तम बोया हुआ है

- प्रदीप सौरभ
१ जनवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter