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        नया वर्ष आया

 
रहे झूलते आशाओं की अब तक आँख-मिचौली में
नया वर्ष आया कितनी सौगाते
लेकर झोली में

भोर उतर कर देहरी-देहरी शगुन सातिये टाँक रही है
शुभ संदेशों वाली पाती हवा खोल कर बाँच रही है.
रंग नये भर रहीं रश्मिया
आँगन की रंगोली में

आहट पाकर नये बरस की मन का पाखी डोल रहा हैं
नयी उड़ानों के सपनो संग पंख हवा में तोल रहा है
लौटेंगे मौसम खुशियों के फिर
ऋतुओं की डोली में

बांध चुप्पियों के टूटेंगे, कलुष सभी मन के छूटेंगे
बैठ अलावों के घेरों में बातों के झरने फूटेंगे
कट जायेंगे दुख सब मन के यों ही
हँसी ठिठोली में

मन के पंछी रहे चहकते रंग खुशी के रहे महकते
उत्सव और उमंगो वाले दिन आँगन में रहे खनकते
द्वार न अब हो कोई सूना दीवाली
और होली में

- मधु शुक्ला
१ जनवरी २०२६

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