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         यों झर रहा दिसंबर

 
यों झर रहा दिसंबर
इस वर्ष के तने से
ज्यों पात आखिरी सा
मेहमां है कुछ दिनों बस

अटका है फुनगियों पर
यों ठंडी आह भरता
नववर्ष है वो आता
मिलना हो उससे कैसे
निष्ठुर हैं लोग कितने
उस आखिरी पल में
करते विदा जशन संग
बूढ़ा हुआ बरस बस

मालूम है सभी को
मिलना नहीं कभी फिर
यादों में बस रहूँगा
कुछ पल सुनहरे बनकर
सदियों का है चलन ये
बीती बिसारने का
आगे की सुध लेना
है फ़लसफ़ा यही बस

कोशिश रहे कि आगे
ये साल अच्छा जाए
पहलगाम जैसे मंजर
कभी लौट के न आएँ
खौफनाक हादसों में
जिंदा जले न कोई
लौट आए भाईचारा
है इल्तिजा यही बस

- इला सिंह
१ जनवरी २०२६

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