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देख क्षितिज पर अरुणाई को,
मृदुल हो गये स्वर
ज्यों का त्यों है मौसम केवल
बदला कैलेंडर
रंग पड़े हैं फीके सारे, पृष्ठों के पिछले
गहराये थे और अधिक जो, दुखड़े थे छिछले
सरल जिन्हें समझे थे दिन वे
कटे बड़े दुष्कर
विहग-वृंद से हिल्लोलित थी, नैनों की झीलें
उजड़े-उजड़े वहाँ खड़े अब, वीराने टीलें
लुटे अश्रु दुख के आतप ने
शेष बचे प्रस्तर
उर के बंजर भू पर फिर भी, आशा अँखुआई
नवल वर्ष की चाहे करना, 'जीवन' पहुनाई
प्रेम-गीत के निर्झर फिर हैं
बहने को तत्पर
भीमराव जीवन
१ जनवरी २०२६ |