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      वर्ष नव का यह गगन

 
आओ मेरे साथ देखो वर्ष नव का यह गगन
फिर कहेंगे स्वागतम

मोर देखो और देखो नीलगाएँ
आओ उन पर रीझ लें वंशी बजाएँ
जागरण ही स्तवन है मत रहो ख़ुद में मगन
फिर कहेंगे स्वागतम

हो जहाँ उल्लास भर दो प्रेममय कर दो दिशाएँ
फूल हर डाली पे लचकें जाफ़रानी हों हवाएँ
तय हुआ है देख तो लो चाँद से अपना मिलन
फिर कहेंगे स्वागतम

शुभ रहे सबके लिए यह कामना है मौन क्यों हो
कवि हृदय की भावना है आओ सब संग-साथ झूमो
फिर करो मिलकर हवन
फिर कहेंगे स्वागतम

- अश्विनी कुमार विष्णु
१ जनवरी २०२६

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