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     नये साल का सूरज

 
धीरे-धीरे स्वप्न बड़े हो जाते हैं
पीछे-पीछे प्रश्न खड़े हो जाते हैं

नये साल का सूरज जैसे उगता है,
जीवन के अनुबन्ध कड़े हो जाते हैं

आसमान में कोहरे का शासन हो तो,
सूरज के प्रतिमान घड़े हो जाते हैं

मुस्काकर स्वागत करते जो पल-पल का,
उनके क्षण-क्षण रत्न-जड़े हो जाते हैं

डाली पर लटका जब दीपू दास जले,
मानवता के कई धड़े हो जाते हैं

तथाकथित कुछ बुद्धजीवियों के मत से,
परम्परा, संस्कार सड़े हो जाते हैं

- उमा प्रसाद लोधी
१ जनवरी २०२६

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