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     नये साल से कहा दिसंबर ने

 
सुनहरे फूल के मानिंद हम भी मुस्कुराएँगे
नए इस साल में फिर से नए सपने सजाएँगे

दिसम्बर जा रहे हो तुम नया ये साल तो देकर
पुराने ज़ख्म इस दिल के मगर कैसे भुलाएँगे

जो देती ही रहीं दिल को बहुत ही टीस रह-रहकर
वो माँझी की सभी ग़ज़लें नहीं अब गुनगुनाएँगे

सबक़ जो दे गया हमको ये गुज़रा वक़्त जितने भी
उन्हीं के साथ हम फिर से नई राहें बनाएँगे

हवाएँ अपनी मर्ज़ी से, जहाँ आएँ जहाँ जाएँ
किसी के भी लिए पर हम न अपना दिल दुखाएँगे

सुनो नववर्ष रस्तों में बिछा दो फूल और कलियाँ
तुम्हारे साथ फिर हम भी नए सपने सजाएँगे

ख़ुशी क्या और क्या ग़म अब हमें जीवन समझना है
समय की धार के ही साथ बस ख़ुद को बहाएँगे

- सीमा विजयवर्गीय
१ जनवरी २०२६

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