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        हमको यकीं है

 
हमको यक़ीं है राह में कलियाँ बिछाएगा
नग़मा ख़ुशी का साल नया गुनगुनाएगा

बीते हुए से सीख ले आगे को जाएगा
उम्मीद है ये साल नये गुल खिलाएगा

इक्कीसवीं सदी का है छब्बीसवाँ ये साल
अब देखते हैं ढंग नया क्या सिखाएगा

हर साल ये ही सोचते हैं कुछ करेंगे खास
क्या साल ये भी सोचने में बीत जाएगा

पत्थर को ही पड़े है ज़रूरत धकेल की
पानी तो अपना रास्ता ख़ुद ही बनाएगा

परदेस में रहेगा यों आख़िर वो कब तलक
पंछी शजर के पास इक दिन लौट आएगा

बच्चा है जनवरी तो दिसंबर बुज़ुर्ग 'रीत'
जब जिसका वक़्त आएगा, वो दम दिखाएगा

-परमजीत कौर 'रीत'
१ जनवरी २०२६

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