अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

        शुभकामनाओं का मंगल गान

 
कोहरे के आगोश से निकलकर
सूरज की नूतन किरणों ने
कड़कड़ाती ठंड से
कंपकपाते चेहरों पर
तपिश की खुशी भर दी

धूप का टुकड़ा
नव वर्ष का संदेश ले
मुंड़ेरों से उतर कर
छत और आँगन में
छा गया

नवल रश्मियों का अभिनंदन
करती धरा
फैला रही हरीतिमा की चादर
बिख़ेर मोतियों का सागर

नव वर्ष की बेला
कलिकाओं ने पट खोला
भ्रमरों ने किया
शुभकामनाओं का
मंगल गान

- बृजेश कुमार शुक्ला
१ जनवरी २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter