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नया साल ले आ गया
 
नया साल ले आ गया
धवल सलोना प्रात
गया वर्ष लिखता रहा
अनुभव के अनुपात

चल कमली कोहरे के पार
वहाँ सजा है अपना खेत
खुद से खुद ही आगे बढ़ जा
झँझवाती से अब तो चेत

भोर किरण देने लगी
खुशियों की सौगात

हम ऐसे मजबूर हुए
कुछ अपने भी दूर हुए
गम की काली चादर फेंक
रमिया अब तू रोटी सेंक

जीवन में करना सदा
उम्मीदों की बात

करो प्रदीप्त प्रेम की ज्वाला
मुँह में सबके पड़े निवाला
सुनो सुहासी तोड़ो फूल
परे हटाओ निर्मम शूल

पलकों पर जाकर रुके
सपनों की बारात

मन का संबल मन की जीत
मन हरसे तो रच दे गीत
ओ जमनी, बन मीठी धारा
घुट घुट कर क्यों होना खारा

आँचल में अधिकार मिले
अटल रहे अहिवात

- ऋता शेखर ‘मधु’
१ जनवरी २०१७

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