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शब्द अर्पित मातु

 

 

 
अर्चना के भाव का लेकर समर्थन
शब्द अर्पित मातु सब
तुमको किये हैं

अर्थ के दुश्चक्र में जो फँस गए हैं
वे पुरातन सन्दर्भ सारे छटपटाते
अब असंगत से प्रलापों के शिखर पर
हो विवश सब तथ्य भी हैं कसमसाते

बस हितों की साधना के इस समय में
आस्था के प्रश्न भौतिक
हो गए हैं

सोच के यूँ संकुचित परिवेश हैं
संशयों को ढो रहे संवाद तपते
इस हृदय के स्पंदनों की वेदना यह
शुष्क से सम्बन्ध बनकर शूल चुभते

नागफनियों से भरे इन बीहड़ों में
अक्षरों के बीज कुछ
माँ बो दिए हैं

- बृजेश नीरज
२९ सितंबर २०१४

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