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जिद्दी मौसम |
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जिद्दी मौसम, बहुत अड़ा है
दिन बेचारा, मौन खड़ा है
कोना कोना अम्बर ढूँढा, सूरज भूला पता-ठिकाना
कोठर भीतर धूप छिप गई, पूछें तो सौ लाख बहाना
नदिया सागर झरने शीतल
पर्वत सर हिमताज जड़ा है
दिन का कद तो बौना-छोटा, रातें हो गई सरू समान
हुई दुपहरी अलसाई सी, ओढ़ दुशाला दुबकी शाम
दीप बुझे हैं निशितारों के
बंद चाँद का द्वार पड़ा है
दुबके बैठे पंछी जंतु जर्जर झीने पात-दुशाले
थरथर काँपें पेड़ डालियाँ माघ चलाये बरछी भाले
ठुरठुर धरती मंतर जपती
मौसम से कब कौन लड़ा है
दिन भी तो चुपचाप पड़ा है
- शशि पाधा
१ दिसंबर २०२५ |
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