अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

         जिद्दी मौसम

 
जिद्दी मौसम, बहुत अड़ा है
दिन बेचारा, मौन खड़ा है

कोना कोना अम्बर ढूँढा, सूरज भूला पता-ठिकाना
कोठर भीतर धूप छिप गई, पूछें तो सौ लाख बहाना
नदिया सागर झरने शीतल
पर्वत सर हिमताज जड़ा है

दिन का कद तो बौना-छोटा, रातें हो गई सरू समान
हुई दुपहरी अलसाई सी, ओढ़ दुशाला दुबकी शाम
दीप बुझे हैं निशितारों के
बंद चाँद का द्वार पड़ा है

दुबके बैठे पंछी जंतु जर्जर झीने पात-दुशाले
थरथर काँपें पेड़ डालियाँ माघ चलाये बरछी भाले
ठुरठुर धरती मंतर जपती
मौसम से कब कौन लड़ा है
दिन भी तो चुपचाप पड़ा है

- शशि पाधा
१ दिसंबर २०२५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter