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राग रंग का पर्व

ठुमरी, चैती, दादरा, पल-पल फाग धमार
राग-रंग का पर्व यह, देता ख़ुशी अपार

फ़सल मगन हो झूमती, फागुन गाता गीत
पीत वसन वसुधा हुई, ताक रहा मनमीत

गोरी खीझे मीत पर, क्यों करते हो तंग
तन में पड़ा गुलाल ज्यों, मन हो गया मृदंग

फागुन में आये नहीं, नहीं करूँगी बात
अवनी 'चैटिंग' कर रही, अंबर से दिन-रात

तंग गली में साजना, गोरी करती तंग
फेंक बारजे से रही, गुब्बारों में रंग

'मैसेज' गोरी ने किया, कब आओगे पास
पोर-पोर दिन कट रहे, फागुन करे उदास

ठंडाई कौतुक करे, लोग लुगाई दंग
गुझिया बालम से कहे, रँग लो अपने रंग

नैना साजन से लड़े, मुख लज्जा से लाल
गोरी हतप्रभ रह गयी, मुट्ठी भरे गुलाल

नीले, काले, लाल में, छिड़ी अनोखी जंग
फागुन से गाढ़ा नहीं, दूजा कोई रंग

मृदुता, मैत्री, मोद का, अनुपम उड़े अबीर
संशय सारे मिट रहे, मन हो रहा कबीर

- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
१ मार्च २०१७

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