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मन-वृंदावन

तन रंग दो-मन रंग दो कान्हा
जीवन में फागुन लौटा दो

स्मृतियों के नील गगन में
सतरंगी दुनिया बिखरा दो
आँचल भर कर स्वप्न सुहाने
घर आँगन खुशियाँ लौटा दो

सूने मन की दीवारों पर
धूमिल रंग न बुझने पाएँ
नेह-रंग में रंग दो जीवन
सारे रंग सँवरते जाएँ
रंगोली सी सजे जिंदगी
सुधियों का सावन लौटा दो

टेसू के फूलों का मौसम
कचनारी आभा मधुवन की
हों गुलाल से नयन बावरे
अनुरागी गाथा जीवन की
मन का रोम रोम पुलकित हो
स्वर्णमयी आभा लौटा दो

- पद्मा मिश्रा
२ मार्च २०१५

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