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गाँव में अलाव
जाड़े की कविताओं को संकलन

गाँव में अलाव संकलन

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

सवेरा है मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पाँव
ओझल गाँव
जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से
मैं देख पाता हूँ
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सर्द साँसों ने
चिनारों को झुलस डाला,
मगर हिमपात को देती
चुनौती एक द्रुममाला,

बिखरे नीड़,
विहँसी चीड़,
आँसू हैं न मुस्कानें,
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूँ।
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

- अटल बिहारी वाजपेयी

   
 

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