जिंदगी जलेबी-सी

 

 
जिन्दगी जलेबी सी
उलझी है, मीठी है

दुनिया की चक्की में
मैदे सा पिसना है
प्यार की नमी से
मन का खमीर उठना है
गोल-गोल घुमा रही
सूरज की
मुट्ठी है

तेल खौलता दुख का
तैर कर निकलना है
वक़्त की कड़ाही में
लाल-लाल पकना है
चाशनी सुखों की
पलकें बिछाये
बैठी है

कुरकुरा बने रहना
ज़्यादा मत डूबना
उलझन है अर्थहीन
इससे मत ऊबना
मानव के हाथ लगी
ईश्वर की
चिट्ठी है

- धर्मेन्द्र कुमार सिंह
१ अप्रैल २०२२

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