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हरि का सिंगार बन हरसिंगार

 

शतदल अधिष्ठित प्राण मेरे
बिखरो प्रतिष्ठित प्राण मेरे
ध्यानरत मंत्रिल प्रहर में
शरद के भीगे नगर में
धर वृंत केसर रूप वैभव
हास स्मित रेख तद्भव
द्रुमदल शिखर तल
ओस गण सा
छितरो हुलसकर ध्यान मेरे

रजतल तिरोहित प्राण मेरे
जागो पुरोहित प्राण मेरे
हरिताग्र पट प्रांगण छहरता
नि:शेष दीपक प्रतिपल निखरता
शुभ्र स्‍वर बहुरुप मुखरित
दिशा-देश समरुप सुरभित
हरि का सिंगार
बन हरसिंगार
निखरो प्रणव सा प्राण मेरे

राजेश कुमार झा
१८ जून २०१२

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