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देवदारु तुम
 

देवदारु तुम सच कह दूँ तो
सदा बहुत सम्भ्रांत लगे हो।

वायु दंश को सह कर तुमने
पत्थर का सम्बल जकड़ा है
बन त्रिशंकु-सा सुदृढ़ लम्बवत
मेघों का आँचल पकड़ा है

जल की जमती और पिघलती
नदियों को संतुलित बनाते
देवदारु तुम
सच कह दूँ तो
देवोमय आद्यान्त लगे हो।

तुमसे मिलने की अभिलाषा
हमें पर्वतों तक ले जाती।
धरती से आकाश जोड़ती
गहन पिपासा मन को भाती।

देव भूमि के संरक्षण का
अभियोजन संविहित बनाते
देवदारु तुम
सच कह दूँ तो
जब मिलते हो श्रांत लगे हो।

घर में पूजित दारु तुम्हारी
चौखट या अगणित कल्पों में।
तुम जीवित हो जनमानस के
प्रासादों में संकल्पों में।

नीड़ विहग वृंदों का होकर
संस्कृति को संयमित बनाते
देवदारु तुम
सच कह दूँ तो
स्वयं एक वेदांत लगे हो।

- निर्मल शुक्ल

१५ मई २०
१६

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