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रोप लें बबूल को
 
मन की जमीन पर
रोप लें बबूल को

काँटेदार वृक्ष के मध्यम आकार हैं
तन को आराम दे यदि वहाँ विकार हैं
हृदय में सहेज लें निंदक
द्विशूल को

गूँजी किलकारियाँ नेह भरे डाल की
औषधि हैं पत्तियाँ दस्त घाव बाल की
हर्ष भरे हाथ से समेटें
रसूल को

आम तो आम है कीकर अनुनाद है
पीत वर्ण फूल में स्मृति का अनुवाद है
क्षण भर विराम दें मुहावरी
तूल को

शुष्क त्वचा भाव में छाल का प्रदेह हो
अँखियों से नीर बहे पात लेपन नेह हो
पतला दतुअन करे वज्र दंतमूल को

अकेसिया कहें इसे है गुणों की खान ये
पात छाल चूर्ण का रोग शोधक पान ये
सहता मौन संत सा व्यंग्य
अयःशूल को

- ऋता शेखर ‘मधु’
१ मई २०२०

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